Kundalini & Sushumna – भय ऐंवम शंका निवारण

  • कुंडलिनी जागृत हो जाने का केवल मात्र अर्थ ये ही नहीं है की वो साधक इस से कोई बहुत बड़ा चमत्कारी या हवा में उड़ने वाला कोई महामानव बन जाय। साधकों को कुंडलिनी का वास्तविक सत्य समझाना चाहिए। कुंडलिनी जागृत होना अलग बात है और संपूर्ण सिद्धियों तक पहुंचना यह अलग बात है। यदि सिर्फ चमत्कारी सिद्धियों को  ही कुंडलिनी जागरण का लक्ष्य समझा जाता है तो यह अपने आप में सबसे बड़ी मूर्खतापूर्ण बात है। कुंडलिनी जागरण का मुख्य लक्ष्य है –सच्चिदानंद स्वरूप में पूर्ण स्थिति प्राप्त कर लेना। सवेंम को अच्छे से जान लेना, समझने लेना। ध्यान की अनंत गहराई में उतर जाना, डूब जाना। अभ्यास करते करते – ध्यान करते हुए असीम आनंद की अनुभूति के साथ लंबे समय तक लगातार ध्यान में बैठे रहने पर भी शरीर का कोई अंग दर्द से व्याकुल नहीं होना। मूलाधार चक्र में ध्यान करने पर प्रकाश पूर्णरूपेण सहस्रार चक्र में अपने सद्व्यवहार द्वारा प्रकाशित होता हुआ दिखाई दे। जिस चक्र पर भी साधक ध्यान करें, वह चक्र पूर्णरूपेण प्रकाशित दिखाई देना। यदि इतना सा अनुभव होने लगा है  तो कुंडलिनी जागृत हो चुकी है। ऐसा करते हुए भविष्य में किसी भी साधक को कोई विशेष सिद्धि मिलती है या नहीं – इस बात का कभी ख्याल न करें। जो व्यक्ति सिर्फ मस्तिष्क में सिद्धियों को ही रखता है, वह वास्तविक में इस मार्ग हेतु पात्र ही नहीं है व वास्तव में इस प्रकार के व्यक्तियों ने कुण्डलनि जागरण को एक पहेली बना कर रख दिया है! अध्यात्म को चमत्कारिक लाभ के प्राप्ति के अतिरिक्त हम किसी बात पर विश्वास ही नहीं करना चाहते। कुंडलिनी जागरण की ऐसी हवा लोगों के दिमाग में भर दी गई है कि जैसे या तो साधक विछिप्त दिमाग का हो जाएगा अथवा ऐसा व्यक्ति संपूर्ण संसार का मालिक बन जाएगा। धरातल पर क्या ऐसा व्यक्ति कभी किसी को दिखाई नहीं देता! अतः – सिद्धियां अथवा विछिप्त दिमाग हो जाने वाली – ये सब बातें – मनगढ़ंत हैं!

यह ऊर्जा का प्रवाह है जो मूलाधार चक्र से विशुद्ध चक्र तक की साधना है जिसे आप ज्यों ज्यों बढ़ाते हैं वैसे वैसे ही संपूर्ण ब्रह्मांड में आप की साधना की ऊर्जा प्रसारित होने लगती है और जो परिणाम आप साधना से लेना चाहते हैं वैसी स्थितियां एवं परिस्थितियां उत्पन्न होने लगती हैजो मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन में जितना अधिक क्रियाशील दिखाई देता है उसकी कुंडलिनी शक्ति उतनी ही जागृत है अब जो मनुष्य जितना अधिक आलसी अकर्मण्य एवं दुर्व्यसनों से घिरा हुआ है उसकी चेतना शक्ति कुंडलिनी उतनी ही  सुषुप्त है।

  • जहां तक बात है, कुंडलिनी जागरण किये हुए व्यक्तियों की तो वो असंख्य हैं। कुछ वर्ष पूर्व ही ब्रह्मलीन श्रधेय श्री राम शर्मा आचार्य जी के आध्यात्मिक ऐंवम सांसारिक के मध्य सन्तुलित सद्व्यवहार को देखते हुए हम दावे के साथ कह सकते हैं की उनकी कुंडलिनी शक्ति जागृत थी! वास्तविक अर्थ में हम कुंडलिनी शक्ति को इसी रूप में पहचानें की साधक का पंचतत्त्व सम्बंधित व्यवहार कितना सन्तुुुलित है?
  • Sushumna actually means sukha-mana—that is, a joyful (sukha) mind (mana).
  • For a Vedic Holistic Well-being, we need to Awaken Kundalini – a state of conscious spiritual energy which flows gradually upward in Sushumna, through 6 Chakras and gets illuminated at Crown Chakra.
  • Root Chakra में सुषम्ना आजु बाजु स्थित इड़ा पिंगला नाड़ियों संग सुप्त अवस्था में पाई जाती है! चक्रों के सन्तुलन से इड़ा पिंगला का सुषम्ना मिलन होने से सुषम्ना, कुंडलिनी अवेकनिंग हेतु वाहन का कार्य करती है!
  • जितनी अवस्था में चक्र बैलेंस्ड होंगे – उसी अनुपात से सुषम्ना एक्टिवेट होगी ऐंवम उस एक्टिवेटिड सुषम्ना से उतनी ही गुणात्मक मात्रा में कुंडलिनी जागरण होगा!
  • जितने समृद्ध सन्तुलित चक्र – उतनी ही समृद्ध – सुषम्ना ऐंवम कुंडलिनी ऐंवम उतनी ही आनंदमय जीवन पद्धति!
  • कुंडलिनी: योग अनुसार, मूलाधार चक्र छेत्र में मेरुदण्ड के नीचे कुंडलिनी नामक संग्रहित ऊर्जा जो एक सांप के से रूप में साढे तीन लपेटे मारे हुए स्थित होती है, उसका उसी स्थान पर स्थित ‘सुषुम्ना नाड़ी’ द्वार में से प्रविष्टि हो, विभिन्न सन्तुलित चक्रों का भेदन कर, ऊपर आज्ञा चक्र में पहुंच – जाग्रत होने पर स्वयंज्ञान की प्राप्ति होती है! इससे एक बात साफ साफ निकल कर आई की कुंडलिनी जागरण हेतु – सुषम्ना का एक्टिवेशन होना भी लाज़िमी है व कह सकते हैं की सुषम्ना, कुंडलिनी हेतु एक Channel- एक वेहीकल का कार्य करती है!
  • सुषम्ना: मेरुदण्ड के बायें में इड़ा/चंद्र ऊर्जा/गंगा व दाएं में पिंगला/सूर्य ऊर्जा/जमुना ऐंवम मध्य में सुषम्ना – यानि सरस्वती, ये तीनों नाड़ियां, मेरुदण्ड से जुड़े होते हैं। हम में से काफी व्यक्तियों के जीवन में सुषम्ना जो मानव शरीर-विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है वह निष्क्रिय बनाा रहत है व उस के बजाय, इड़ा और पिंगला के प्रभाव की प्रधानता रहने से कभी कभार हमारा व्यवहार सन्तुलित नहीं रह पाता! सुषम्ना को एक्टिवेट किये बिना, यदि हम इड़ा व पिंगला के प्रभाव में ही रहेंगे तो हम अशांत महसूस करने लगते हैं क्योंकि इड़ा और पिंगला का स्वभाव ही क्रमशः inwardly ऐंवम outwardly होता है। लेकिन सुषुम्ना ऊर्जा यानि जिस अवस्था में इड़ा पिंगला – एकत्रित सन्तुलित हो दोनों नॉस्ट्रिल्स से यानि सुषम्ना नाड़ी एक्टिवेशन से स्वांश आए तो इससे हम जीवन में संतुलन पा सकते हैं! यदि हमारे जीवन में एक बार सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश हो जाए, तो हम एक नए तरह का संतुलन पा लेते हैं, जिससे, हम पर बाहरी स्थितियों का नगण्य प्रभाव पड़ता है। आसन, हस्त मुद्रा ऐंवम बीज मंत्र चिंतन करते हुए – अनुलोम-विलोम प्राणायाम की रेचक कुम्भक विधि से दोनों नासिका छिद्रों से बारी-बारी से वायु को भरा और छोड़ा जाता है। अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आ जाता है, जब चंद्र और सूर्य नाड़ी से समान रूप से श्वास-प्रश्वास प्रवाहित होने लगती है – जिसे सुषम्ना एक्टिवेशन कहा जाता है! उस अल्पकाल में सुषुम्ना नाड़ी से श्वास प्रवाहित होने की अवस्था को ही ‘योग की सर्वोत्तम स्थिति’ कहा जाता है। इसके अनुसार ध्यान, प्राणायाम, हस्त मुद्रा योग, बीज मंत्र जप योग और आसन करने से, सुप्त कुँडलिनी ऊर्जा मेरु के नीचे से इड़ा पिंगला सुषम्ना – युक्त त्रिवेणी से होकर सुषम्ना के माध्यम से मस्तिष्क तक 5 चक्रों से होकर आज्ञा चक्र नामक- छटे चक्र पर पहुंच – इड़ा पिंगला का सुषुम्ना युक्त त्रिवेणी संगम होना ही – सुषम्ना एक्टिवेशन होता है! इसे ही सरस्वती संगम –  शिवशक्ति मिलन कहा जाता है! तत्पश्चात, सुषम्ना का क्राउन यानि सहस्रार चक्र में पहुंचने को कुंडलिनी शक्ति जागरण कहते हैं!
  • कहते हैं की कुंडलिनी एक पावर प्लग सॉकेट अथवा एक जनरेटर की तरह है! प्लग सॉकेट में कई पिन प्लग पॉइंट होते हैं। सात चक्रों में मूलाधार चक्र एक प्लग पॉइंट की तरह है, जबकि बाकी बचे छह चक्रों में से पांच प्लग की तरह हैं, जिन्हें मूलाधार से जुडऩे पर बिजली यानी ऊर्जा मिलती है। सातवां चक्र – बिजली के बल्ब के समान है। जैसे ही आप इसका प्लग लगाते हैं, आपकी हर चीज दमकने लगती है। अगर आपने प्लग ठीक से लगा दिया यानि यदि हमने अपना मूल आधार चक्र सही से जागृत कर लिया तो ऊर्जा के मूल स्रोत से जुड  जाने के कारण, हमें पूरे जीवन ऊर्जा का मिलना तय मानें। 

🤳 कुंडलिनी जागरण विधि ?

✍️ कुंडलिनी शक्ति हमारे संपूर्ण शरीर में समायी हुई समस्त नाड़ियों का सूक्ष्म चेतनात्मक ऊर्जा तत्व है। हमारे शरीर में उपस्थित रहकर संपूर्ण शरीर के क्रियाकलापों को संचालित करने वाली ऊर्जा ही कुंडलिनी ऊर्जा है। हमारे शरीर से बाहर संपूर्ण ब्रह्मांड जिस ऊर्जा से गतिमान हो रहा है, चल रहा है, वह ऊर्जा ही कुंडलिनी उर्जा है अर्थात हमारे शरीर के अंदर संपूर्ण क्रियात्मकता का कारण कुंडलिनी ऊर्जा है और संपूर्ण ब्रह्मांड की गतिविधियों का कारण भी कुंडलिनी ऊर्जा ही है। हमारे शरीर के प्रत्येक अंग एवं अवयव में चेतना शक्ति का संचार हो रहा है और प्रत्येक स्थान में चेतन तत्व विद्यमान है किंतु संपूर्ण शरीर में से मूलाधार चक्र जहां पर जनन ग्रंथियां हैं वहां पर हमारे शरीर की सर्वाधिक ऊर्जा संग्रहित होती है। यही केंद्र ऐसा है जहां पर नवजीवन सृजन करने की शक्ति संग्रहित होती है। साधारणतया हमारी मूलाधार चक्र की शक्ति अधोगामी अर्थात बाहर की ओर निकलने के लिए ही होती है किंतु जब साधक योग साधना का सहारा लेता है तो उसकी वह ऊर्जा उर्ध्वगामी होने लगती है। यहां पर सबसे बड़ी समझने की बात यह है कि मूलाधार चक्र जो हमारे सूक्ष्म शरीर में विद्यमान है व उसके अंदर जो चेतन तत्व है, उसकी ऊर्जा ऊपर की ओर उठने लगती है जिसे प्राण शक्ति कहते हैं। प्राण अर्थात वायु। आसन, ध्यान प्राणायाम, बीजमंत्रों के नियमित अभ्यास से प्राप्त ध्यान की ऊर्जा की सहायता से जब हमारे शरीर के अंदर विद्यमान इस प्राण वायु की शक्ति जागृत हो जाती है तो इसके प्रभाव से साधक ऊर्जा को मूलाधार चक्र से पूर्णतया स्वाधिष्ठान चक्र से होते हुए, सहस्रार चक्र में प्रवाहित करने में समर्थ निश्चित रूप से हो जाता है। शरीर के अलग-अलग भागों में प्राण, अपान ,समान, व्यान ,उदान आदि प्रकार की अलग-अलग वायु का प्रवाह होता है । सामान्यतया हमारे शरीर में स्थूल जड़ तत्व की प्रधानता होती है किंतु जब हम प्राणायाम का अभ्यास करते हैं व आंतरिक एवं बाह्य कुंभक क्रिया करते हैं तो हमारे शरीर में जड़त्व के स्थान पर सूक्ष्म तत्वों का आधिक्य होने लगता है। जैसे जैसे हमारी कुंभक क्रिया अधिक होती जाती है अर्थात प्राण के निरोध की शक्ति बढ़ती जाती है, वैसे वैसे हमारे समस्त शरीर की नाड़ियों में दिव्यता बढ़ती जाती है, जैसे-जैसे दिव्यता बढ़ती जाती है वैसे-वैसे साधक का मन- मस्तिष्क एकाग्र होने लगता है। ध्यान पूर्ण एकाग्रता के साथ लगने लगता है, अब साधक जिस चक्र या स्थान पर भी अपने ध्यान को एकाग्र करता है उसी चक्र या स्थान पर शरीर के अंदर अद्भुत उर्जा उत्पन्न होने लगती है। यह ऊर्जा उस चक्र के क्षेत्र में आने वाली समस्त नाड़ियों को दिव्य प्रकाश से भर देती है। इस दिव्य प्रकाश के प्रभाव से उस क्षेत्र की नाड़ियों में विद्यमान दिव्य शक्तियां जागृत होने लगती है जिन्हें उस चक्र की देव शक्तियां कहा जाता है ,जैसे-जैसे साधक अलग-अलग चक्रों में अपने ध्यान की ऊर्जा को बढ़ाता जाता है वैसे वैसे उसका संपूर्ण शरीर सिद्धावस्था को प्राप्त करता जाता है। साधक बाहर से बहुत कुछ बदला हुआ दिखाई नहीं देता बस उसका शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा हो जाता है एवं आंखों एवं चेहरे में तेज दिखाई देने लगता है किंतु आंतरिक स्तर पर साधक के प्रत्येक अंग प्रत्यंग में आमूलचूल परिवर्तन हो चुका होता है। जब साधना करते हुए मूलाधार चक्र से लेकर आज्ञा चक्र तक के संपूर्ण चक्रों में ऊर्जा का प्रवाह सुचारू रूप से होने लगता है तो उर्जा सहस्रार चक्र तक पहुंचने लगती है। ऐसी स्थिति में साधक जब मूलाधार चक्र में ध्यान करता है तो कंपन सहस्रार चक्र में अनुभव होने लगते हैं एवं संपूर्ण सहस्रार चक्र प्रकाशित होता हुआ अनुभव होता है। जिस प्रकार एक लंबे पाइप में पानी का प्रवाह एक सिरे पर जोड़ने पर दूसरे सिरे में पानी स्वतःही निकलने लगता है ।उसी प्रकार जब समस्त चक्र जागृत हो जाते हैं तो मूलाधार चक्र में ध्यान करने पर ऊर्जा का प्रवाह सहस्रार चक्र में प्रवाहित होने लगता है। यही कुंडलिनी शक्ति का जागरण है ,जिससे प्राण का प्रवाह मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक होने लगता है।
✍️ अज्ञानी गुरुओं ने ऐसी हवा बना रखी है कि कुंडलिनी जागरण एक बहुत ही खतरनाक एवं कठिन प्रक्रिया है इसे नहीं करना चाहिए। निश्चित ही कुंडलिनी जागरण एक कठोर एवं श्रमसाध्य प्रक्रिया है किंतु जो साधक मानवता के हित में इस साधना को करने के लिए तैयार हो उन्हें इसका सौभाग्य मिलना चाहिए । दूसरी बात कुंडलिनी जागृत हो जाना ही समस्त दिव्य शक्तियों को प्राप्त कर लेने की निश्चित शर्त नहीं है। यह ऊर्जा का प्रवाह है जो मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक होने लगा है ,इससे सिर्फ इतना सा कहा जा सकता है कि साधक अब उस परब्रह्म परमात्मा से संपर्क साध सकता है। इसके आगे आप ज्यो ज्यो साधना को बढ़ाते हैं वैसे वैसे संपूर्ण ब्रह्मांड में आप की साधना की ऊर्जा प्रसारित होने लगती है और जो परिणाम आप साधना से लेना चाहते हैं वैसी स्थितियां एवं परिस्थितियां उत्पन्न होने लगती है।
✍️ जो मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन में जितना अधिक क्रियाशील दिखाई देता है ,उसकी कुंडलिनी शक्ति उतनी ही जागृत है ।अब जो मनुष्य जितना अधिक आलसी ,अकर्मण्य एवं दुर्व्यसनों से घिरा हुआ है उसकी चेतना शक्ति कुंडलिनी उतनी ही सुषुप्त है।
✍️ जब हम योग साधना एवं मंत्र जप का सहारा लेते हैं तो हमारे अंदर ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है। हमारी समस्त नाड़ियों में क्रियाशीलता बढ़ जाती है। हमारे शरीर के प्रत्येक अवयवों में एक सूक्ष्म चेतन शक्ति का संचार होने लगता है। ज्यो-ज्यो हमारी योग साधना एवं मंत्र जप बढ़ता जाता है त्यों त्यों हमारी प्रत्येक नाड़ी में दिव्यता बढ़ती जाती है एवम हमारे शरीर में मौजूद स्थूल तत्व के स्थान पर दिव्य तत्व का आविर्भाव होने लगता है। हमारी शारीरिक ,मानसिक एवं आध्यात्मिक क्रियाशीलता दिनों दिन बढ़ती जाती है। हम शारीरिक रूप से समस्त आदि व्याधियों से मुक्त ,मानसिक रूप से अत्यधिक बुद्धिमान तर्क एवं आत्मिक उन्नति के चर्म शिखर की ओर बढ़ने लगते है। हमें खुदगर्जी के स्थान पर परोपकार में आनंद आने लगता है।
✍️ यदि साधना पथ पर बढ़ते हुए साधक से कभी कुछ गलत हो जाता है तो आत्मचेतना मार्ग में अवरोध पैदा करती है एवं ऐसा करने से रोकती है।

  • Kundalini is said to be in the form of a serpentine coiled three and a half times, facing downwards and remain sleeping in root chakra, at the spine base.This serpent power, connected with the Mother Earth residing in the hole of a Nadi, known as Sushumna.
  • Sushma a central Nadi based at the spine and Root Chakra is surrounded by two other nadis – Ida in left and Pingala in right.
  • Ida nadi ­– located to the left of the spine and carries feminine lunar energy. Starts in the muladhara chakra and ends in the left nostril.
  • Pingala nadi – located to the left of the spine and carries masculine solar energy. Starts in the muladhara chakra and ends in the right nostril.
  • Combo of Ida and Pingla and Sushumna Subtle Nadies at Root Chakra, is known as Mukt Triveni. When Ida, the left side nostril breath, also known as Ganga or Moon Cool / Shakti Energy Channel, which controls the Right Side Para sympathetic Brain Nervous system (for involving one in activities such as art, dancing, and relaxation)  and the Pingala, the right nostril breath, known as Yamuna or Sun Hot / Shiva Energy Channel, which controls the Left Side Brain Sympathetic Nervous system (for involving one in numbers, making strategic business decisions), Sushumna responsible for Yogic Deads – all move upward – through the properly activated and well balanced first Five Subtle Body Energy Chakras namely Root, Sacral or Hara, Solar Plexus, Heart and Throat Chakra – to get merged with each other at Sixth Chakra – The Third Eye Point. This position of Ida, Pingla and Sushumna is known as Sushumna Activation or the Yukt Triveni, or we can say that Shakti has merged with Shiva at Third Eye Chakra Point and as a test – if we feel calm and tranquil then, Sushumna – the central channel of Ida and Pingla, the left and right chanels, is said to have become Activated. It is said that at this point the energy of Shakti or Ida is brought upwards to meet her divine equivalent in the form of Shiva or Pingla – known as Sushumna, where the individual experiences spiritual illumination!
  • The ida and pingala nadis criss-cross each other as they spiral upwards and connect to opposite nostrils at the Third Eye or Command Agya Chakra, while the sushumna travels straight up the spine to the crown of the head – known as Kundalini Awakening! 
  • To get awakened, kundalini enters through the hole of sushumna and starts traveling from lower to higher chakra layers.This is important to know that a Sushumna activation is the precondition for the Kundalini to become Awakened.To Sum up -For Kundalini Awakenin
  • 1. First of all – the first 5 Chakras be cleansed n balanced
  • 2. Then left chanel Ida & right chanel Pingla get merged in the central chanel Sushumna at Third Eye Chakra,
  • 3. Finally Kundalini travels to Crown – Higher Chakra through Sushumna

To do that – we make use of Integrated approach of the following Vedic Sciences: – Water, Earth, Space, Air and Fire – the Five Element’s resultant Vatta, Pitta and Kapha Body Humours Balancing through- Hastamudras Yoga Therapy,

Understanding ones Natal Strength through Astro Planets,

Meditation and Nadi Shodhan Breathing Pranayama Yoga along with making use of Chakras Beeja Mantras and Hasta Mudras for balancing Ida and Pingala to merge at Third Eye Chakra as Sushumna.

Advanced Pranayama practice done with deep breathing Rechak Kumbhak, Beeja Mantras and Vatta Shamak Hasta Mudra produces heat energy and thereby first sushmna is activated and then kundalini is awakened and passes upwards through lower to higher chakras along with the sushumna nadi.

HastaMudras Beej Mantras in Chakras Balancing:

Note: Cleansing & Balancing of first five Chakras will automatically open up the next higher chakras – hence it is advisable to keep concentrate on first five chakras in starting.

  1. Root Chakra – Prithvi Mudra लं
  2. Sacral Chakra – Varun Mudra वं
  3. Solar Plexus – Surya/Agni Mudra रं
  4. Heart Chakra – Vayu Mudra यं
  5. Throat Chakra – Shoonya Mudra हं
  6. Third Eye Chakra – Gyan Mudra शं ॐ
  7. Crown Chakra – Linga Mudra ॐ
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