How Mudras Help in Kundalini Jagran- Ajith


Mudra is about free electrons at the finger tips having concentrated nerve root endings , getting redirected back INTERNALLY to the brain along chosen neural circuits. This is very differnt from external acupressure aue acupunture.

Five forces are controlled by Mudra.  They are  Prana, Apana, Samana, Vyana, and Udana, and they are part of the  Kundalini’s energy.

Through Mudras you  gather these five forces together, bringing them to their home, the Mother Kundalini, which is sleeping at the Muladhara Chakra,  as Static energy of the Mother of the Universe. Your Kundalini is sleeping. It has to be awakened , or you have NOT experienced ecstasy and bliss on this planet.

When the Apana rises upward to the ‘Fire Chakra,’ the flame of divine fire grows strong and bright, being fanned by Apana. When the Apana fire mixes with the Prana, which is naturally hot, the spiritual heat of the body becomes bright and powerful.   

When the Kundalini feels this extra heat, she will awaken from sleep; then she goes into the Sushumna.  The Kundalini is coiled like a serpent, and by Mudra the Kundalini will certainly move and open the mouth of the Sushumna.  

Without moving the Kundalini, there are no other means that will clear away the impurities of the 7200 Nadis.  The Great Goddess Kundalini, the Energy of the Self, sleeps in the Muladhara. She has the form of a serpent, having three coils and a half. As long as she is asleep in the body, (finer body), the jiva is a mere animal, and true wisdom does not arise.

Some of the important Mudras: Maha , Nabho , Udiyana, Maha Bandha, Maha Vedha, Kechari, Jalandhara, Yoni, Viparitakarna, Kaki, Sambhavi etc

Mudras will NOT be taught by a Guru, unless he sees that you are worthy of being taught. Or it is like giving a tinderbox to a money.


When you know man, you know the universe.

Yajur Veda reveals :  “Yatha pinde tatha brahmande, yatha brahmande tatha pinde”–   “As is the individual, so is the universe, as is the universe, so is the individual.”


Mudras are NOT mere finger and hand gestures . They are closed electrical circuits” of the subtle channels in physical and etheric bodies which offer psychic protection.   They have been created by ancient Hindu seers . .  They retain the efficacy of the audible shabda brahmAn with more potency.

The Gherand Sanhita and the Vajrayana Tantra advise that the Mudras are capable of bestowing great  psychic abilities ( siddhi ) on their practitioners.

Ancient Indian sculptures show various Mudras. There are 108 of them in Mantra Shastra (the book of incantations), Upasana Shastra (the book of worship and prayers) and the Nritya Shastra (the book of classical dances).

The gains from all mudras are permanent and achieved without interfering with the natural working of the body mind or spirit.

By touching together of the tips of the fingers or the finger tips to other parts of the palms this free energy (Prana) is redirected back into the body along specified channels, back up to the brain. The redirected energy traveling through the nerves stimulates the various chakras. Keeping the hands on the knees stimulates the Gupta Nari and makes the energy start from the Mooladhara Chakra.

Tension applied to the nerve/s and/or the neural or psycho-neural circuits formed by the mudras help in balancing the five basic elements (or building blocks).

This balancing of the tension, and redirection of the internal energy effects the changes in veins, tendons, glands and sensory organs, to bring the body back to a healthy state.

Mudra devised by seers is a very exact and scientific yogic function by which one can develop or  change, one’s internal and external dispositions viz. mental (anger, emotional disturbance, intelligence etc.), spiritual (concentration, meditation) or physical (in various diseases, illnesses).

There is NO allopathic medicine for all these emotional states which cause loss of sleep and affect your work and harmony in the home.  They are like literal remote control switches bringing quick and effective changes.

The function of the human body is much like a transformer, receiving energy from the Universal flow of Prana, distributing that energy, and then eliminating it

The 24 words of the Gayatri Mantra have a special relationship with 24 mudras known as GAYATRI MUDRAS. They have different names and formations. The importance of Mudras is also clear from the grim qualifier to these:

  1. Etaa Mudraa na jaanaati, Gaayatri nishphalaa bhaveta


Another View of Chakras Activation for Kundalini Jagran;

(1.पृथ्वी – Root लं), (2.वरुण – Sacral वं), (3.अपान – Solar Plexus रं), (4.अपान वायु – Heart यं), (5.सूर्य – Throat हं), (6.ज्ञान – Third Eye ॐ), (7.शून्य – Crown Chakra ॐ) (हिंदी English) (Kind Courtsey:- Shree C.V. RAVINDRANATH)

सातवें सत्र के बाद

फरवरी 14, 2015

सी.वी. द्वारा रविनद्रनाथ | in आयुर्वेद – योग – SPIRITUALITY और SPIRITUAL QUESTIONNAIRE

कुछ लोगों को मिडास टच का आशीर्वाद दिया जाता है, वे जीवन में जो भी करते हैं वह सफल हो जाता है। शानदार, कई आश्चर्य है कि क्या ये करतब किस्मत या फ्लक्स हैं लेकिन अपनी सात इंद्रियों की मदद से वे भी अपने भाग्य को बदल सकते हैं

तांत्रिक फिजियोलॉजी के अनुसार, हमारे पास पांच इंद्रियां हैं, दृष्टि, गंध, ध्वनि, स्वाद और स्पर्श जो हमारे भावना अंगों के माध्यम से मस्तिष्क से जुड़े हैं, और हमारे अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा सक्रिय हैं। अंतःस्रावी ग्रंथियाँ चक्रों (ऊर्जा केंद्रों), शिरोर (निकायों) और कोष (म्यान) से जुड़ी होती हैं।

हमारी महत्वपूर्ण जीवन शक्ति ऊर्जा जिसे कुंडलिनी कहा जाता है:

तीन निकाय – (i) स्तुला (भौतिक), (ii) शुष्मा (सूक्ष्म) और (iii) कर्ण (कारण)।

2) पांच कोष – (i) अनामिका कोष (शारीरिक म्यान), (ii) प्राणमाया कोष (सांस म्यान) – (iii) मनोमय कोष (मानसिक म्यान), (iv) विजयनम कोष (ज्ञान म्यान), (v) आनंदमय कोष कोशा (आनंद म्यान)।

3) इन सात चक्रों में अंतःस्रावी ग्रंथियां होती हैं और

अंग:

i) मूलाधार चक्र: (जन्म केंद्र) में वृषण और अंडाशय होते हैं – लिंग और योनि – संबंधित अंगों के रूप में प्रजनन प्रणाली।

ii) स्वाधिष्ठान चक्र: (मृत्यु केंद्र) अधिवृक्क ग्रंथियों से मेल खाता है – गुर्दे और बृहदान्त्र – मूत्र प्रणाली।

iii) मणिपुर चक्र: (सौर जाल) अग्न्याशय और प्लीहा से संबंधित है – आंत और यकृत – पाचन तंत्र।

iv) अनाहत चक्र: (हृदय केंद्र) थाइमस ग्रंथि से मेल खाता है – हृदय और फेफड़े – श्वसन प्रणाली।

v) विशुद्धि चक्र: (गले का केंद्र) थायराइड और पैराथायराइड ग्रंथियों – गले, मुंह और जीभ – वाणी और ध्वनि प्रणाली से मेल खाता है।

vi) अजना चक्र: (थर्ड आई) पिट्यूटरी और हाइपोथैलेमस ग्रंथियों से मेल खाती है – मस्तिष्क (आंशिक), आंखें और कान – दृश्य प्रणाली।

vii) सहस्त्रार चक्र: (क्राउन) पीनियल ग्रंथि से मेल खाता है – मस्तिष्क – चेतना (उप-चेतन मन, चेतन मन और बुद्धि)।

जब कुंडलिनी (जीवन शक्ति ऊर्जा), जो एक कुंडलित सर्प की तरह सोती है, किसी भी तांत्रिक साधना से उत्तेजित होती है, तो वह मूलाधार चक्र (मोच की नोक / कोक्सीक्स के सामने) से स्वाधिष्ठान चक्र तक पहुंचती है। यहां मूल वृत्ति, कामुकता रचनात्मकता में बदल जाती है। मंत्र ‘लाम’ है, जबकि मुद्रा ‘पृथ्वी मुद्रा’ (पृथ्वी का मुद्रा) और रंग लाल है।

1.PRITHVI MUDRA – पृथ्वी का मूलाधार (मूलाधार चक्र):

विधि: अनामिका की नोक अंगूठे की नोक को छूती है, दूसरी तीन अंगुलियों को फैलाकर।

विशेषता: सभी शारीरिक कमजोरियों को कम करता है।

समय अवधि: यह किसी विशेष समय अवधि तक सीमित नहीं है। आप किसी भी समय इसका अभ्यास कर सकते हैं।

लाभ: यह कमजोर लोगों के लिए वजन बढ़ाने में मदद करता है, त्वचा के रंग में सुधार करता है और त्वचा को चमकदार बनाता है और शरीर को स्वस्थ रखकर सक्रिय बनाता है।

जब कुंडलिनी स्वाधिष्ठान चक्र (नाभि और लिंग के बीच, जघन की हड्डी के ऊपर) से निकलती है, तो भय, घृणा, क्रोध, लालच, हिंसा जैसी प्रवृत्ति निर्भयता, प्रेम, करुणा, दान, अहिंसा में बदल जाएगी; मंत्र AM VAM ’है, जबकि मुद्रा Mud वरुण मुद्रा’ (पानी का कीचड़) है और रंग नारंगी है।

वरुण मुद्रा – जल का मंत्र (स्वाधिष्ठान चक्र): विधि: छोटी उंगली की नोक अंगूठे की नोक को छूती है, जिसमें तीन अन्य अंगुलियां फैली हुई होती हैं। विशेषता: यह पानी की मात्रा को संतुलित करता है और उन सभी बीमारियों को रोकता है जो पानी की कमी के कारण होती हैं। समय अवधि: यह किसी विशिष्ट समय अवधि तक सीमित नहीं है और कोई भी इसे सुविधा के अनुसार अभ्यास कर सकता है। लाभ: यह शरीर में पानी की मात्रा को संतुलित करके रक्त में स्पष्टता बनाए रखता है। यह गैस्ट्रोएंटेराइटिस और मांसपेशियों के संकोचन के दर्द को रोकता है। जब कुंडलिनी मणिपुर चक्र (नावेल / डायाफ्राम) से ऊपर जाती है, तो संदेह और दमन जैसी प्रवृत्ति विश्वास और अभिव्यक्ति में बदल जाएगी; मंत्र m रुम ’है जबकि मुद्रा Mud अपाना मुद्रा’ (पाचन की मुद्रा) और रंग पीला है।
अपान मुद्रा – पाचन का मुद्रा (मणिपुर चक्र): अपान वायु का संबंध पृथ्वी तत्व और मूलाधार चक्र से है। How To : मध्यमा और अनामिका की युक्तियां अंगूठे की नोक को स्पर्श करती हैं, जबकि अन्य दो अंगुलियों को फैलाया जाता है। विशेषता: यह हमारे स्वास्थ्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि यह उत्सर्जन प्रणाली को नियंत्रित करता है। समय अवधि: कम से कम 45 मिनट के लिए दैनिक अभ्यास और लंबे समय तक अभ्यास करने से अधिक लाभ मिलता है। लाभ: यह मधुमेह को नियंत्रित करता है, कब्ज और बवासीर को ठीक करता है और अपशिष्ट के उत्सर्जन को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसके अलावा, वह अनाहत चक्र (हृदय, स्तनों के बीच का उभार), कल्पना, स्वप्न, अहंकार और प्रेम जैसी वृत्तियों को दृढ़ संकल्प, दृष्टि, मिशन (सेवा) और करुणा में बदल देती है, जहां मंत्र ‘यम’ है, जबकि मुद्रा ‘अपान वायु मुद्रा’ (हृदय की मुद्रा) और रंग हरा है।
अपान वायु मुद्रा – हृदय का चक्र (अनाहत चक्र): विधि: मध्यमा और अनामिका की युक्तियां अंगूठे की नोक को स्पर्श करती हैं, जबकि तर्जनी अंगूठे के आधार को छूती है और छोटी उंगली बाहर की ओर फैली होती है। विशेषता: यह हृदय को लाभ पहुंचाता है और दिल के दौरे की रोकथाम में एक इंजेक्शन की तरह काम करता है और यह सॉर्बिटेट गोलियों की तरह शक्तिशाली है। यह शरीर में गैस की मात्रा को कम करता है। समय अवधि: जितनी बार आप कर सकते हैं उतनी बार अभ्यास करें। बेहतर परिणाम के लिए दिल के मरीज और बीपी के मरीज रोजाना दो बार 15 मिनट तक इसका अभ्यास कर सकते हैं। लाभ: यह दिल को मजबूत करता है, धड़कन को नियंत्रित करता है, उत्सर्जन प्रणाली और गैस्ट्रिक समस्याओं से छुटकारा दिलाता है। उसकी अगली उड़ान विशुद्धि चक्र (गले) के लिए है, जहां भाषण की वृत्ति स्पष्टता, पवित्रता और भक्ति की दिव्यता में परिवर्तित हो जाती है। मंत्र H ’HAM’ है जबकि मुद्रा ra सूर्य मुद्रा ’(सूर्य का मुद्रा) और रंग नीला है।
सूर्य मुद्रा – सूर्य का मुद्रा (विशुद्धि चक्र): विधि: अनामिका को मोड़कर अंगूठे से दबाएं। विशेषता: यह थायरॉयड ग्रंथि के केंद्र को तेज करता है। समय अवधि: 5 से 15 मिनट के लिए दो बार दैनिक अभ्यास करें। लाभ: यह कोलेस्ट्रॉल कम करता है और वजन कम करने में मदद करता है, चिंता कम करता है और अपच को ठीक करता है। पंच महाभूतों की पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और ईथर नामक पाँच तत्व सामंजस्य और एकता के लिए संतुलित हैं। अगले दो चक्र अतिचेतनता या ईश्वरत्व के बराबर हैं। जब कुंडलिनी अजना चक्र (भौंहों के बीच – तीसरी आंख) तक पहुंचती है, तो ज्ञान, दृष्टि, मिशन और अन्य मानसिक क्षमताओं के मूल लक्षणों को ज्ञान, अंतर्दृष्टि, अंतर्ज्ञान और आनंद में बदल दिया जाएगा; यहाँ मंत्र ’ओम’ है, जबकि मुद्रा ra ज्ञान मुद्रा ’(ज्ञान की मुद्रा) और रंग इंडिगो है।
ज्ञान मुद्र – ज्ञान का मुद्रा (अंजा चक्र) विधि: तर्जनी के सिरे को अंगूठे की नोक से छुएँ, दूसरी तीन उँगलियों को फैलाकर। विशेषता: यह ज्ञान की मुद्रा है, यह ज्ञान को बढ़ाता है। अंगूठे की नोक में पिट्यूटरी और अंतःस्रावी ग्रंथियों के केंद्र हैं। जब हम इन केंद्रों को दबाते हैं तो अंगूठे और तर्जनी ग्रंथियां उत्तेजित होती हैं। समय अवधि: इस मुद्रा के लिए कोई विशेष समय अवधि नहीं है। आप ऐसा कर सकते हैं जब भी और जहाँ भी आपके पास समय हो, बिस्तर पर बैठकर, खड़े होकर या लेटकर अभ्यास करें। लाभ: स्मरण शक्ति बढ़ाता है और दिमाग तेज करता है, एकाग्रता बढ़ाता है और अनिद्रा से बचाता है। यदि हम नियमित रूप से अभ्यास करते हैं तो यह मन, हिस्टीरिया, क्रोध और अवसाद से संबंधित सभी मनोवैज्ञानिक विकारों को ठीक कर देगा। अंत में, जब वह सहस्रार चक्र (सिर का मुकुट, पीनियल ग्रंथि के ऊपर) में स्थानांतरित होता है, तो अस्तित्व को गैर-अस्तित्व में बदल दिया जाएगा, ‘निर्वाण’ मंत्र ‘ओम’ है, जबकि मुद्रा ‘शुन्य मुद्रा’ है ’(शून्यता या शून्य का मुद्रा) रंग बैंगनी है। यह अनंत और अनंत काल की एक पूरी तरह से अलग वास्तविकता है जहां अस्तित्व का ब्रह्मांड के साथ विलय किया जा रहा है, एक अतिचेतनता, जहां अतीत और भविष्य वर्तमान के रूप में दिखाई देगा – समय और स्थान द्वारा सीमित नहीं।
शुन्य मुद्र – शून्यता का चक्र (सहस्त्रार चक्र): विधि: शुक्र पर्वत पर मध्यमा उंगली रखें और अंगूठे से दबाएं। विशेषता: यह शरीर की सुस्ती को कम करता है। समय अवधि: कोई भी बीमारी से ठीक होने तक रोजाना 40 से 60 मिनट तक इसका अभ्यास कर सकता है। लाभ: यह 4 से 5 मिनट के भीतर कान का दर्द दूर करता है और बहरे और मानसिक रूप से विकलांग लोगों के लिए उपयोगी है। इतिहास कहता है कि कृष्ण, बुद्ध और क्राइस्ट ने इसे प्राप्त किया था और आधुनिक विज्ञान के संदर्भ में, यह सातवें अर्थ का जागरण है – सत्य, शांति और सद्भाव के उच्चतम लोकों के लिए चेतना का पारगमन। इसके लिए हमें मंदिर, चर्च, मस्जिद या गुरुद्वारे जाने की जरूरत नहीं है। आइए अब हम अपनी सातवीं इंद्रिय को इस सिद्ध कुण्डलिनी – तांत्रिक ध्यान के माध्यम से जागृत करते हैं।
AWAKENING THE SEVENTH SENSEFeb 14, 2015by C.V. RAVINDRANATH | in AYURVEDA – YOGA – SPIRITUALITY and SPIRITUAL QUESTIONNAIRE

Some people are blessed with the midas touch, whatever they do in life becomes a success. Bewildered, many wonder whether these feats are luck or fluke but with the help of their seven senses they too can chalk out their destiny

According to Tantric Physiology, we have five senses, sight, smell, sound, taste and touch which are connected to the brain through our sense organs, and activated by our endocrine glands. The endocrine glands are connected to the chakras (energy centres), sharirs (bodies) and koshas (sheath).

Our vital life force energy called Kundalini passes through:
Three bodies – (i) Stula (physical), (ii) Shushma (astral) and (iii) Karanna (causal).

2) Five Koshas – (i) Anamaya Kosha (Physical sheath), (ii) Pranamaya Kosha (Breath sheath) – (iii) Manomaya Kosha (Mental sheath), (iv) Vijyanamaya Kosha (Knowledge sheath), (v) Anandamaya Kosha (Bliss sheath).

3) These Seven Chakras have corresponding endocrine glands and
organs :
i) Muladhara Chakra: (Birth Centre) has the testes & ovaries – penis and vagina – Reproductive systems as corresponding organs.
ii) Swadisthana Chakra: (Death Centre) corresponds to the adrenal glands – kidneys and colon – Urinary systems.
iii) Manipura Chakra: (Solar Plexus) corresponds to the pancreas and spleen – intestines and liver – Digestive system.
iv) Anahatha Chakra: (Heart Centre) corresponds to the thymus gland – heart and lungs – respiratory system.
v) Visudhi Chakra: (Throat Centre) corresponds to the thyroid and parathyroid glands – throat, mouth and tongue – speech and sound system.
vi) Ajna Chakra: (Third Eye) corresponds to the pituitary and hypothalamus glands – brain (partial), eyes and ears – visual system.
vii) Sahashrar Chakra: (Crown) corresponds to the pineal gland – brain – consciousness (sub-conscious mind, conscious mind and intellect ).

When the Kundalini (vital life force energy), which sleeps like a coiled serpent, is aroused by any tantric meditation, she uncoils and rises from the base, Muladhara Chakra (tip of the spine/in the front of coccyx) to Swadhistana Chakra. Here the basic instinct, sexuality is transformed into creativity. The mantra is ‘LAM’, while the mudra is ‘Prithvi mudra’ (Mudra of Earth) and the colour is Red.

1.PRITHVI MUDRA – Mudra of Earth (Mooladhara Chakra):
Method: The tip of the ring finger touches the tip of the thumb, with the other three fingers stretched out.
Specialty: Reduces all physical weaknesses.
Time Duration: It is not limited to any particular time duration. You can practice it at any time you want to.
Benefits: It helps to increase weight for weak people, improves the complexion of skin and makes the skin glow and makes the body active by keeping it healthy.

When the Kundalini moves up from the Swadhisthana Chakra (between the navel and sex centre, above pubic bone), instincts like fear, hate, anger, greed, violence will be transformed to fearlessness, love, compassion, charity, non-violence; the mantra is ‘VAM’, while the mudra is ‘Varuna Mudra’ (mudra of water) and the colour is Orange.

2. VARUNA MUDRA – Mudra of water (Swadhisthana Chakra) :
Method: Tip of the little finger touches the tip of the thumb, with other three fingers stretched out.
Specialty: It balances the water content and prevents all diseases which are due to the lack of water.
Time Duration: It is not limited to any specific time duration and one can practice it according to convenience.
Benefits: It retains clarity in blood by balancing water content in the body. It prevents the pain of Gastroenteritis and muscle shrinkage.

When the Kundalini moves up from the Manipura Chakra (Navel/Diaphragm), instincts like doubt and repression will be transformed into trust and expression; the mantra is ‘Rumm’ while the mudra is ‘Apana Mudra’ (mudra of digestion) and the colour is Yellow.

3. APANA MUDRA – Mudra of Digestion (Manipura Chakra) :
Method: The tips of the middle finger and the ring finger touch the tip of the thumb while the other two fingers are stretched out.
Specialty: It plays an important role in our health as it regulates the excretory system.
Time Duration: Practiced daily for at least 45 minutes and longer practise yields more benefits.
Benefits: It regulates diabetes, cures constipation and piles and helps to regulate the excretion of waste. Further, she climbs to Anahatha Chakra (Heart, midway of sternum between breasts), instincts like imagination, dreaming, ego and love will be converted into determination, vision, mission (service) and compassion, where the mantra is ‘YAM’, while the mudra is ‘Apana Vayu mudra’ (mudra of heart) and the colour is Green.

4. APANA VAYU MUDRA – Mudra of the Heart (Anahatha Chakra) :
Method: The tips of the middle finger and the ring finger touch the tip of the thumb, while the index finger touches the base of thumb and little finger stretched out.
Specialty: It benefits the heart and works like an injection in the prevention of heart attack and is as powerful as sorbitate tablets. It reduces the gas content in the body.
Time Duration: Practice as many times as you can. Heart patients and BP patients can practice it for 15 minutes daily twice for better results.
Benefits: It strengthens the heart, regulates palpitations, the excretory system and relieves gastric problems.

Her next flight is to Vishuddhi Chakra (Throat), where the instinct of speech is converted into clarity, purity and divinity of communion. The mantra is ‘’HAM’ while the mudra is ‘Surya Mudra’ (mudra of the sun) and the colour is Blue.

5. SURYA MUDRA – Mudra of the Sun (Vishudhi Chakra):
Method: Bend the ring finger and press it with the thumb.
Specialty: It sharpens the center of the thyroid gland.
Time Duration: Practice daily twice for 5 to 15 minutes.
Benefits: It reduces cholesterol and helps to reduce weight, reduces anxiety and corrects indigestion.

The five elements called ‘Pancha Mahabhutas’ earth, water, fire, air and ether are balanced for harmony and unity. The next two chakras are equated to superconsciousness or godliness.

When the Kundalini reaches the Ajna Chakra (between the eyebrows – The third eye), the basic traits of knowledge, vision, mission and other psychic abilities will be transfigured into wisdom, insight, intuition and bliss ; here the mantra is ‘OM’, while the mudra is ‘Gyan Mudra’ (mudra of knowledge) and the colour is Indigo.

6.GYAN MUDRA – Mudra of knowledge (Anja Chakra)
Method: Touch the tip of the thumb to the tip of the index finger, with the other three fingers stretched out.
Specialty: As it is a mudra of knowledge, it enhances knowledge. The tip of thumb has centres of pituitary and endocrine glands. When we press these centres the thumb and index finger the glands are stimulated.
Time duration: There is no particular time duration for this mudra. You can
practice by sitting, standing or lying on a bed whenever and wherever you have time.
Benefits: Increases memory power and sharpens the brain, enhances concentration and prevents Insomnia. If we practice regularly it will cure all psychological disorders related to the mind, hysteria, anger and depression.

At last, when she transcends to Sahasrara Chakra (crown of the head, above the pineal gland), the existential being will be transformed into the non-existence, ‘NIRVANA’ the mantra is ‘OM’, while the mudra is ‘Shunya mudra’ (mudra of emptiness or nothingness) the colour is violet. It is a totally different reality of infinity and eternity where the being is merged with the Universe, a superconsciousness, where the past and the future will be visible as the present – not limited by time and space.

7. SHUNYA MUDRA – Mudra of Emptiness (Sahashrar Chakra) :
Method: Keep the middle finger at the mount of Venus and press it with the thumb.
Specialty: It reduces the dullness of body.
Time Duration: One can practice it for 40 to 60 minutes daily until cured from disease.
Benefits: It relieves earache within 4 to 5 minutes and is useful for the deaf and mentally challenged.
History says that Krishna, Buddha and Christ had achieved it and in terms of modern science, it is the awakening of the seventh sense – a transcendence of consciousness to the highest realms of Truth, Peace and Harmony. For this we do not need to go to temples, churches, mosques or to Gurus. Let us now enkindle our seventh sense, through this Siddha Kundalini – Tantric Meditation.

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