“हरेरामहरेकृष्ण” मंत्र ऐंवम नाड़ीशोधन – हस्तमुद्राओं द्वारा आध्यात्मिक – मनोशारीरिक उन्नति हेतु कुंडलिनी जागरण पद्धति

कुंडलिनी जागरण प्रयोग:-
1. डीप ब्रीथिंग् नाड़ी शोधन प्राणायाम सँग रूद्र+शून्य हस्त मुद्रा कॉम्बो में, प्रभु सम्मुख – पूर्ण समर्पण भाव से “हरे राम हरे कृष्ण” महामंत्र जप ऐंवम मणिपुर चक्र से सम्बंधित सुबह उठ कर कोसा जलपान आदि कोई भी संकल्प लेेेनेे ऐंवम विशुद्ध चक्र से सम्बंधित सत्य बोलने के संकल्प लेेनेे के अभ्यास से पंचमहाभूतों ऐंवम प्रथम पांच चक्रों को जागृत कर- सुषुम्ना नाड़ी – कुंडलिनी जागृत कर – स्वस्थ रहने बारे – एक प्रयास।
प्रयोग एक:– सर्वप्रथम – सुबह अथवा रात्रि/शाम अथवा सुविधा अनुसार दोनों समय, 20 से 40 मिनट तक के लिए, रीढ़ की हड्डी को साध कर, ध्यान से उत्पन्न होनेवाले ऊर्जा प्रवाह को लीक होने से बचाने हेतु – कोई ऊष्मा कुचालक जैसे की कम्बल – टाट का आसन बिछा – किसी भी सुगम आसन में आराम पूर्वक बैठ कर – निम्नचित्र अनुसार – दोनों हाथों से – रुद्र हस्त मुद्रा (मणिपुर चक्र सन्तुलन हेतु) ऐंवम शून्य (हैवेन) हस्त मुद्रा (विशुद्ध चक्र सन्तुलन हेतु) एक साथ लगाएं। रुद्र हस्त मुद्रा महादेव भगवान शिव को समर्पित है ऐंवम इस के अभ्यास से अग्नि (Super Consciousness ऊर्जा शक्ति प्रतिनिधि), पृथ्वी (समस्त शारीरिक अंग प्रतिनिधि) ऐंवम वायु (Self Conciousness प्रतिनिधि) तत्त्वों के समायोजन से अभ्यासी मनोशारीरिक तौर पर दुरुस्त रहता है। शून्य हस्त मुद्रा को heaven hasta mudra भी कहा जाता जो – ध्यान लगाने की सर्वोत्तम स्थिति में सहायक है तथा शरीर की numbness व शाररिक पीड़ाओं को दूर रख – साधक लंबे समय तक ध्यान आसन की स्थिति में रह सकता है। अतः इन दोनों मुद्राओं को योगी फ्रेंडली माना जाता है तथा वस्तुतः यह स्थिति योग हेतु निस्संदेह ही आदर्श है। 

Rudra Mudra Helps in the Spiritual Attainment as it Stimulates the Third Chakra (Solar Plexus/ Manipura Chakra) –  the centre of vitality and fire in the body which increases willpower, self-confidence & concentration.
Due to the flow of earth elemental energies to the head area, we never feel dull, weighed down or dizzy or fall ill. 
Since the earth element rules the energy of the stomach, spleen, and pancreas, the spleen becomes able to filter the blood and the pancreas makes the enzyme that digests food to prevent disorders in the stomach, such as indigestion, high cholesterol, diabetes nausea and vomiting. 
This also helps in curing Low Blood Pressure as it ensures a proper flow of energies of the earth element in the body to clear the blockage of our veins. This increases blood circulation in the body.
Better circulation of blood makes the blood pressure normal.  This also Helps in Burning Fat, since practice of Rudra mudra produces heat inside their body and increases metabolism, which helps in burning fat & removing the impurities from the body.
It also improves eyesight.
Shunya Hasta Mudra:- Most of meditation practitioner use this mudra for better concentration and meditation that can also seen this mudra in most of Buddha’s statue. 
It helps to calm a restless and anxious mind of a Vata constitution person.
This also helps in treating disorder of ear, numbness & pain in body parts like chest, stomach, head & travel sickness or vertigo.

प्रयोग दो. विष्णु हस्त मुद्रा ऐंवम अनुलोम विलोम एडवान्स्ड स्टेज योग:-

उपरोक्त विधि के कुछ दिन के अभ्यास के पश्चात – हम चाहें तो – हरेरामहरेकृष्ण महामंत्र का जप-मनन अनुलोम विलोम सँग विष्णु हस्त मुद्रा (वात्त नाशक मुद्रा) प्रयोग से भी कर सकते हैं। हम दाहिने हाथ से – तर्जनी व मिडिल फिंगर्स से विष्णु हस्त मुद्रा लगाएंगे ऐंवम थंब को दाहिने स्वर तथा पहली दो उंगलियों से बाएं स्वर के नोस्ट्रिल को थामेंगे। बायें हाथ से – प्राण हस्त मुद्रा ऐंवम विष्णु हस्त मुद्रा कॉम्बो का प्रयोग करेंगे – ताकि हमें पूर्ण ऊर्जा भी प्राप्ति भी होती रहे। सभी मुद्राओं को हमारी वेबसाइट www.hastamudras.com पर देखा समझा जा सकता है। अब आप हरेरामहरेकृष्ण मंत्र का मनन करते हुए, मात्र एक दफा – बाएं स्वर से सांस भीतर भरें – फिर 4 बार मन्त्र मनन करते हुए स्वांस को रोक कर रखें। फिर दाहिने स्वर से दो दफ़ा मंत्र जप मनन करते हुए- स्वांस को बाहर निकालें। फिर जितना समय स्वांस भीतर लिया था – उससे दोगुने समय मंत्र मनन करते हुए रोके रखें व फिर एक दफ़ा मानसिक मंत्र जप करते हुये –  स्वांस अंदर भरें  – उस से 4 गुने अधिक समय तक मंत्र का मानसिक चिंतन करते हुए – स्वांस अंदर रोके रखें – फिर – जितनी देर स्वांस लिया था – उस से दोगुना दाहिने नोस्ट्रिल से बाहर निकाल दें तथा फिर उतनी ही देर रोक कर रखें। ततपश्चात – दाहिने स्वर से पुनः एक मंत्र के बराबर गिनती तक स्वांस भीतर भरें व इस क्रिया को बारम्बार जब तक दोहराते रहें – जब तक – समय ऐंवम सामर्थ हो। प्राणायाम की समाप्ति भी – प्राणायाम शुरू करने की भांति – बाएं स्वर से – एक बार ही हरेरामहरेकृष्ण मंत्र मनन करते हुए भरें। 1:4:2:2 के अनुपात एक बार फिर से समझ लें-1पूरक:4अभ्यांतर कुम्भक:2रेचक:2बाहृय कुम्भक (पूरक का अर्थ है श्वास लेना और रेचक का अर्थ है श्वास छोड़ना व कुम्भक का अर्थ है- स्वांस को रोक कर रखना। श्वास लेने और छोड़ने के बीच हम कुछ क्षण के लिए रुकते हैं। इस रुकने की क्रिया को ही कुंभक कहते हैं। जब श्वास लेकर हम अंदर रुकते हैं तो उसे आभ्यांतर कुंभक कहते हैं और जब बाहर रुकते हैं तो उसे बाह्य कुंभक कहते हैं)इसी प्रकार से पुनः 1:4:2:2 …. यानि जितनी देर स्वांस भीतर लें – उस से 4 गुने अधिक समय तक रोकें, फिर 2 गुने समय तक स्वांस बाहर निकालें ऐंवम फिर 2 गुने समय तक स्वांस को अंदर ही रोके रखें।

यह समझना भी आवश्यक है की – जागृत मणिपुर चक्र अपने से नीचे वाले मूलाधार ऐंवम स्वाधिस्ठान चक्रों को भी जागृत करने में समर्थ है तथा विशुद्ध चक्र अपने से निचले अनाहत चक्र को भी जागृत करने में समर्थ है व जागृत मणिपुर चक्र भी अनाहत चक्र के जागरण में सहायक होता है तथा ठीक इसी प्रकार से जागृत विशुद्ध चक्र – निचले चारों जागृत चक्रोंकी सहायता से – अपने दोनों – शीर्ष – आज्ञा ऐंवम सहस्रार चक्रों को जागृत करने में सहायक है। सहस्रार वास्तव में चक्र नहीं है बल्कि यह साक्षात तथा संपूर्ण परमात्मा और आत्मा है। जो व्यक्ति सहस्रार चक्र का जागरण करने में सफल हो जाते हैं, वे सवेंम पर पूर्ण नियंत्रण कर लेते हैं। प्रायः सभी लोगों में अंतिम दो चक्र सोई हुई अवस्था में रहते हैं। अतः इस चक्र का जागरण सभी के बस में नहीं होता है। इसके लिए कठिन साधना व लंबे समय तक अभ्यास की आवश्यकता होती है। इसका मन्त्र ‘ॐ’ है व आज्ञा चक्र संतुलन साधना भी ज्ञान मुद्रा में ॐ अथवा ॐ ललितं श्रीधरम सँग अलग से भी की जा सकती है।रुद्र+शून्य मुद्रा निर्माण: दोनों हाथों के थम्बस को अनामिका- रिंग फिंगरस ऐंवम तर्जनी तर्जनी की टिप्स से मिलाएं तथा मिडिल फिंगरस को अंगूठों की जड़ों में लगा कर रखने से – रुद्र+शून्य मुद्रा का निर्माण होता है।
फिर, धीमी गति से “हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे” – “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे” महामन्त्र का अथवा केवल “हरेरामहरेकृष्ण” बीजमंत्र मन मन में अजपे जप का ध्यान करते हुए – स्वांस को नीचे पेट तक धीमी गति से पूरा भरने का प्रयास करें व फिर स्वांस को धीमी गति से महामंत्र को धीमे स्वर में बोलते बोलते अथवा मन मन में जप करते हुए – इस प्रकार से बाहर निकालें की Exhaling – Inhailing की तुलना में बराबर या दोगुनी समय में हो तथा कोशिश करें की एक मिनट में मात्र 8 से 4 स्वांस का cycle पूरा हो। यदि ये संभव न लगे तो कुछेक प्रारंभिक दिवसों तलक – मात्र – “हरे राम हरे कृष्ण” बीजमंत्र का ही जप करें।रीढ़ की हड्डी को साध कर बैठने का मुख्य लाभ यह होगा की – इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन का भरपूर मात्रा में उत्पन्न होना ऐंवम उपयोग कमसे कम होना – यानि दिनभर के कार्यों के उचित संपादन हेतु – पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा उपलब्ध होना। इस से उत्पन्न ऊर्जा का परीक्षण आप अक्टूबर आदि माह में आसानी से कर सकते हैं – आप रीढ़ की हड्डी को बिना सीधा साधे कुछ देर ध्यान हस्त मुद्रा में बैठें तो शायद आप को कम मात्रा में उष्मता महसूस होगी – लेकिन back bone हड्डी को सीधे साध कर ध्यान मुद्रा में बैठें तो – यकीनन आप के शरीर में शीघ्र ही – अधिक मात्रा में उष्णता उत्पन्न हो – पसीना भी आने को होगा!
हरे राम हरे कृष्ण महामंत्र में, हम देखेंगे की –राम:- “र” + “आ” + “म” में :- “र” यानि अग्नि का स्वभाव है– की जो हमारे दुर्गुणों ऐंवम पाप कृत्यों को भस्म कर – हमें कोरा बर्तन सम बनने में सहायक है! “र” – यानि वो अग्नि जो – हमारे सभी संचित शुभ अशुभ कर्मों को स्वाहा कर – हमें – नए सिरे से जीवन जीने का सुअवसर प्रदान करे।  सोलर चक्र में ही स्थित अग्नि हमारे भोजन को पचा – हमारे पोषण में भी सहायक है! ये हमारे मणिपुर चक्र की ज्वाला है जो सदैव उर्ध्वगामी हो – कुंडलिनी वाहक सुषम्ना को अनाहत चक्र की ओर अग्रसित करती है!
“अ” यानि भानु बीज मंत्र– प्रत्यक्ष चेतन रूप में विष्णु भगवान – सूर्य रूप में हमें हमारे अंदर से प्रकाशित कर – हमारा पोषन करते हैं।
“म” यानि चन्द्र अमृत वर्षा।  “म” उच्चारण करते ही – चन्द्र अमृत किरणें हमें शीतलता प्रदान कर – स्थाई शांति की प्राप्ति होती है जो फिर बाहर नहीं निकलती क्योंकि “म” उच्चारण करते ही हमारे होंठ स्वतः ही लॉक्ड हो जाते हैं! दूसरे, “म’ से चन्द्र से जल की प्राप्ति होती है व हम जानते हैं की जल ही जीवन है- अतः “म” – जीवन दाई है!
“रा” – “म” मंत्र में – म से इड़ा नाड़ी यानि चन्द्र स्वर ऐंवम “रा’ से पिंगला यानि सूर्य स्वर के संयुक्त उच्चारण से इड़ा पिंगला का संतुलन हो – हमारे मस्तिष्क के Sympathetic Nervous System ऐंवम Parasympathetic Nervous Systems का एकीकरण प्रारंभ होने लग जाने से Central Nervous System balanced होने लगता है या यूं कहें की इड़ा पिंगला के एकीकरण प्रक्रिया प्रारंभ होने से ‘सुषम्ना नाड़ी” का स्वतः ही एक्टिवशन होने लग जाता है!
हरे उच्चारण में – “ह” उच्चारण से विशुद्ध चक्र एक्टिवेशन हेतु प्रयुक्त होने वाले- “हं” बीज मंत्र की ध्वनि सम्मलित होने से “आकाश तत्त्व ऐंवम विशुद्ध चक्र (Throat)” स्वतः ही एक्टिवेशन होने लगते हैं! विशुद्ध चक्र जागृत होने से – मानव जीवन में ‘वाक्य’ शुद्धिकरण हो जाने से, ऊपर के आज्ञा व सहस्रार तथा निचले अनाहत चक्रों में भी स्वतः ही सन्तुलन प्रक्रिया शुरू हो जाती है!

हरे में – “ह” के पश्चात – “र” उच्चारण से मणिपुर चक्र जागरण हेतु प्रयुक्त होने वाले “रं” बीजमन्त्र की ध्वनि सम्मलित होने से “अग्नी तत्त्व ऐंवम मणिपुर चक्र Solar Plexus” का जागरण भी स्वतः ही होने लगता है तथा जागृत मणिपुर चक्र द्वारा- निचले – स्वाधिस्ठान ऐंवम मूलाधार चक्रों को भी जागृत करने की प्रक्रिया भी स्वतः ही प्रारंभ होने लग जाती है!
“र” उच्चारण से एक लाभ यह भी मिलता है की – मणिपुर चक्र में जो यज्ञ रूपी अग्नि ज्वाला प्रज्जलित होती है – वो अग्नि फ्लेमस सदैव ऊपर की ओर ही जाती हैं तो – इन ऊपर उठती अग्नि ज्वाला शक्ति सँग चक्रों में समाहित सुषम्ना ऐंवम सुषम्ना में समाहित कुंडलिनी शक्ति भी उर्द्धगवामी हो – अनाहत चक्र में सुगमता से प्रविष्ट होने लग जाती है!
यदि हमारी सांसारिक ऐंवम आध्यात्मिक यात्रा में कभी हम अपनी साधना करते करते  – सफलता अथवा “कर्ता भाव यानि EGO” भी आ जाय – तो “हरेरामहरेकृष्ण” उच्चारण से प्राप्त अग्नि ऊर्जा से वो सभी भस्म हो, हमारे भीतर – प्रभु सम्मुख – आत्मसमर्पण की भावना उत्पन्न हो – हमारी चक्र सुषम्ना कुंडलिनी यात्रा सुगम बनने लग – हमारा कल्याण उद्धार होने लगता है!
रही सही कसर –  कृष्ण बीज मंत्र के उच्चारण से पूरी हो जाती है। कृष्ण – सन्धिविछेदन से उत्पन्न “कृ तथा ष्ण” बीजमन्त्र उच्चारण से, हमारे भीतर फ्लेक्सिबिलिटी जागरण से हम राग-मुक्त ऐंवम रोग-मुक्त मानसिक, भैतिक व शारिरिक तौर पर कल्याणमय हो जाते हैं। निम्नवर्णित व्याख्या में हम समझेंगे – की हरेरामहरेकृष्ण महामन्त्र व नाड़ीशोधन अभ्यास से हमारे ”घुटने दर्द” कैसे ठीक होने लगता है? हरेरामहरेकृष्ण मंत्र से धमनियों में रुकावट (एथेरोस्क्लेरोसिस) – Atherosclerosis i.e., aging of the blood vessels – inflexibility of the blood vessels in terms of circulation में आश्चर्यजनक रूप से लाभदायक सिद्ध होता है। जितनी तेजी से हम हरेरामहरेकृष्ण महा मंत्र का जप करते हैं – उतनी तेजी से ही हमारी circulation improve होती है व Heart को भी tone up करता है तथा cerebrum (मस्तिष्क) ऐंवम  peripheral nervous system सभी की – circulation improves होती है। “कृ” उच्चारण ध्वनि तरंगों से हमारे “मनोशारीरिक” स्वभाव में फ्लेक्सिबिलिटी, एडपटिबिलिटी की भावना जागृत होती है व “ष्ण” से लैट गो ऑफ एवरी थिंग भाव उत्पन्न होने से हमारे मनोशारीरिक स्वभाव में उत्पन्न ऐंवम अनावश्यक एकत्रित भाव, टॉक्सिन्स – एरोगेंस – ईगो – “मैं’ व कर्ता भाव समाप्त हो – आत्मशुद्धि होती है! जिस से हम – जड़ता को त्याग – मनोशारीरिक तौर पर भी फ्लेक्सिबल बनने लगते हैं! घुटनों का दर्द – कुछ और नहीं बल्कि हमारी जड़ता – नॉनफ्लेक्सिबिलिटी ही होती है – जो शनः शनः इस अभ्यास से जाती रहती है – व हमारे घुटने फ्लेक्सिबल बन – दर्द मुक्त रहने लग जाते हैं! तो हम कह सकते हैं की – “हरेरामहरेकृष्ण” मंत्र ऐंवम हस्तमुद्रा सँग नाड़ी शोधन प्राणायाम दीर्घकालिक अभ्यास- Knee Pain दूर करने बारे तथा बीमारी की अवस्था में डॉक्टर / हस्पताल से शीघ छुट्टी दिलावाने में हरेरामहरेकृष्ण मंत्र जप- Specific है।

हठयोग प्रदीपिका ग्रंथ अनुसार भी– “ह” का अर्थ है – सूर्य ऐंवम “ठ” का अर्थ है “चंद्र तथा योग का अर्थ होता है “मिलाना“ अर्थात – सूर्य एवं चंद्रमा ऊर्जा-शक्तियों का मिलन।हमारे शरीर के बायें ऐंवम दाहिने दोनों नासिका छिद्रों में स्थित – “इड़ा” यानि चन्द्र जो शक्ति कहलाता है ऐंवम मूलाधार चक्र में स्थित होती है तथा नेगेटिव एनर्जी/ सिम्पथैटिक नर्वस सिस्टम भी कहलाता है एवं “पिंगला” यानि सूर्य नामक जो दो केंद्र बिंदु हैं – जो पौरुष शक्ति है तथा मणिपुर चक्र में स्थित होता है व जो पॉजिटिव एनर्जी/ पारासिम्पैथीटिक नर्वस सिस्टम भी कहलाता है – उन को किन्हीं योग पद्धितियों (जैसे की – लोमविलोम प्राणायाम – सूर्य शक्ति राम-में ‘र” ऐंवम चंद्र शक्ति – राम-में “म” (हरे) बीजमंत्रों – रुद्र हस्त मुद्राओं आदि) की सहायता से उन्हें मिलाकर सम अवस्था में अथवा ‘सुषुम्ना” मार्ग में लाना ही हठ योग कहलाता है। सूर्य एवं चंद्र की ऊर्जा को हमारे दोनों नासिका छिद्र प्रवाहित करते हैं। दाँया नासा छिद्र पिंगला नाड़ी कहलाता है जो सूर्य स्वर है और बाँया नासा छिद्र इडा नाडी कहलाता है जो चंद्र स्वर है। इन्हीं दोनों स्वरों को सम अवस्था में लेकर सुषुम्ना स्वर में प्राण का प्रवाह कर देना ही हठयोग है अर्थात सूर्य चंद्र का मिलन करके सुषुम्ना मार्ग से सहस्रार स्थित परब्रह्म की ओर बढ़ना ही हठयोग है या यूं कहें कि मणिपुर चक्र स्थित सूर्य केंद्र में कुंडलिनी रूपी सूर्य की प्राण ऊर्जा को सुषुम्ना मार्ग के द्वारा उधर्वगामी करके सहस्रार चक्र स्थित परब्रह्म परमात्मा की चंद्र स्वरूपी आनंददायी ऊर्जा से संयुक्त कर देना ही हठ योग है। संक्षिप्त में – प्राण ऊर्जा के प्रवाह को सुषुम्ना मार्ग में प्रवाहित करके सहस्रार चक्र तक प्रवाहित कर देना ही हठ योग है।
योग शास्त्र में देखा जाए तो जैसे राम बीजमंत्र में -‘रा’ वर्ण को सौर ऊर्जा का कारक माना गया है। यह हमारी रीढ़-रज्जू के दाईं ओर स्थित पिंगला नाड़ी में स्थित है। यहां से यह शरीर में पौरुष ऊर्जा का संचार करता है। तथा ‘म’ वर्ण को चन्द्र ऊर्जा कारक अर्थात स्त्री लिंग माना गया है। यह रीढ़-रज्जू के बांई ओर स्थित इड़ा नाड़ी में प्रवाहित होता है।इसीलिए कहा गया है कि श्वास और निश्वास में निरंतर र-कार ‘रा’ और म-कार ‘म’ का उच्चारण करते रहने से दोनों नाड़ियों में प्रवाहित ऊर्जा में सामंजस्य बना रहता है। अध्यात्म में यह माना गया है कि जब व्यक्ति ‘रा’ शब्द का उच्चारण करता है तो इसके साथ-साथ उसके आंतरिक पाप बाहर फेंक दिए जाते हैं। इससे अंतःकरण निष्पाप हो जाता है। 
दूसरे – हरे को यदि श्रीहरीजी जी की “शक्ति-राधा” यानि प्राण ऊर्जा शक्ति माना जाए तो – यह शक्ति जो – मूलाधार चक्र में सूक्ष्म शरीर में सुप्त अवस्था में होती है – वह शब्द मंत्र घर्षण से उत्पन्न ऊर्जा से सक्रिय हो – उर्धगामी होने लग जाती है – जिस के फलस्वरूप – प्राण शक्ति ऊर्जा – मूलाधार चक्र के स्वाधिस्ठान चक्र की ओर अग्रसित होने लग जाती है। यानि हरेरामहरेकृष्ण महामंत्र – To Change The Order Divine Order में भी समर्थ है – यानि यह हमारे पूर्व संचित शुभ अशुभ फल को स्वाहा कर – हमारे जीवन का नए सिरे से सॉफ्टवेयर तैयार करता है।”अ” यानि भानु बीजमंत्र – जो हमें – प्रकाशित कर – हमारा मार्गदर्शन करे ऐंवम “म” यानि चंद्र – शीतल अमृत प्रदान कर – हमारी इड़ा पिंगला ऊर्जाओं को सम बना – सुषुम्ना नाड़ी मार्ग प्रशस्त करे। अथवा – “रा” यानि सूर्य-अग्नि शक्ति ऐंवम “म” यानि चंद्र-शीतलता शक्ति – सम बन – सुषुम्ना मार्ग प्रशस्त हो व यह प्राण ऊर्जा शक्ति – नीचे के चक्रों को भेदन करती हुई – ऊपर के चक्रों तक सुष्मना को पहुचा – कुंडलिनी जागरण करे। इस प्रकार के लगभग दो-तीन माह के अभ्यास से नाड़ी शोधन हो – हम – निम्न विधि से – कुंडलिनी जागरण हेतु – अपनी आगामी यात्रा को तैयार हो जाते हैं।
भाग दो:- हमारी संकल्प शक्ति मूलाधार चक्र को और भी उचित ढंग से अधिक सक्रिय करने में सहायक है तो दूसरी ओर साथ साथ उचित प्रकार से जागृत मूल आधार चक्र भी संकल्प शक्ति को भलि भाँति पूर्वक बढ़ाने में सहायक होता है।
किसी कार्य को मजबूती से करने के संकल्प लेने से हमारा मूलाधार चक्र ऐंवम पृथ्वी तत्त्व मजबूत होने का सबूत मिलता है तथा इस संकल्प को पूरा हो जाने से – मूलाधार चक्र तथा पृथ्वी तत्त्व दोनों पहले से और भी अधिक स्ट्रॉन्ग होते हैं तथा नये संकल्पों के कार्यन्वयन में – ये एक ऐसे “थ्रस्ट फोर्स” की भाँति कार्य करता है – जैसे की  थ्रस्ट फ़ोर्स लगाने से हवाई पट्टी – “रन-वे” पर दौड़ता एक अचानक से टेक ऑफ करता हवाई जहाज। अब आगे यदि हम इस कार्य को प्रैम पूर्वक व खुशी खुशी सरअंजाम दें तो व जल तत्त्व प्रधान वाले – “मन” को विचलित होने से बचा कर काबू में रख – कार्य पर ही ध्यान दे कर सफलता प्राप्त कर सकें तो इस सफलता से अवश्य ही हमारा स्वाधिस्ठान चक्र भी पहले की तुलना में और भी अधिक मजबूत बनता है! उद्धाहरण के तौर पर माना की हम संकल्प लें की हम अपने सभी चक्रों ऐंवम पंच तत्वों को भलि भाँती संतुलित कर – कार्य सिद्धि प्राप्त की छमता को बढ़ाएंगे।इस कार्य सिद्धि हेतु, माना की हम कल से सुबह समय से उठा करेंगे। सुबह जल्दी उठने के संकल्प को हमारे मूलाधार चक्र ऐंवम पृथ्वी तत्त्व के संतुलित होने का आभास हुआ। सो अलार्म लगा दिया। अब सुबह अलार्म बजने पर यदि – बिस्तर छोड़ने में – आराम पस्त “जल खुशी साथ दे दिया तो – समझें की हमारे मूलाधार चक्र सँग स्वाधिस्ठानचक्र भी संतुलन में यह व आगे से – व यह और भी अधिक सन्तुलन में होंगे। स्वाधिस्ठानचक्र जागृत होने से – हमारे – ‘जल तत्त्व” के सन्तुलित हो जाने से – हमारा मन हमारे नियंत्रण में होने लगता है – इधर उधर नही भटकता है व हम अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के साधनों पर अधिक फ़ोकस करना सीख कर – स्वतः ही वांछित मंज़िल प्राप्ति की राह पर अग्रसित होने लग पड़ते हैं। अब यदि हम – लघुशंका से फारिग होते ही –  यथासंभव कोसे जल पान का भी भरपूर उचित मात्रा में सेवन करें तो – इस से हमारी आँतों पर दवाब पड़ने व आंतरिक सफाई से – हमारा पेट भी साफ होगा व आंतो में जमा मल व टॉक्सिन्स से छुटकारा पाने से हमारा – पेट तंत्र मजबूत होगा – जिससे अंततः हमारा मणिपुर चक्र और भी सन्तुलित होगा। संतुलित मणिपुर चक्र से – मेटाबोलिज्म सुदृढ़ हो जाने से हमें – भूख खुलकर लगेगी – भोजन भली भांति पच सकेगा – जिस के फलस्वरूप शरीर के सभी अंग पुष्ट हो – आवश्यक कार्य शक्ति – प्राप्त होगी। तथा कमजोर मेटाबॉलिज्म – मायने – अधिक वजन ऐंवम मजबूत मेटाबॉलिज्म – मायने – उपयुक्त शारीरक वजन। तो अब तक हमने जाना की  मजबूती से निर्णय व संकल्प लेने से हमारा मूलाधार चक्र, स्वाधिस्ठान चक्र व मणिपुर चक्र तीनों मजबूत होंगे।जब हमारा बेसिक चक्र मजबूत होगा तो हमारी Physical Energy Level & Vitality, Sense of Security, Sense of Self Confidence, Self Esteem, भी बढ़ेगा तथा Constipation, Lower Back Pain, Joints Pain, Constipation, Back Bone, Anus related diseases से बचे रहेंगे व जीवन में स्थायित्व प्राप्त हो सवेंम को सुरक्षित महसूस करने लगेंगे।जब हमारा – स्वाधिस्ठान चक्र मजबूत बनेगा तो हम अधिक Socially Sensible, Creative, व नित नए नए Ideas से लबरेज हो Problem Solver बनेंगे तथा Kidney & UTI Diseases, Infertility, Extramarital relationship जैसी वियाधियों से बचे रहेंगे व हमारे व्यक्तित्व में निखार ऐंवम सन्तुलन प्रतीत होगा।मणिपुर चक्र मजबूत होगा तो हमारा आंतरिक सूर्य नाभि चक्र मजबूत बनेगा, जिससे – हम कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अधिक उर्जावान, शक्तिवान, दूरदर्शी – Well organised नेतृत्वकर्ता बन कर निखरेंगे व आत्मविश्वास से लबालब होंगे। बेवजह गुस्सा होने जैसी नकारात्मक मूड स्विंग से बचे रहते सँग में नाभि ऐंवम पेट से सम्बंधित अंगों में digestion, शुगर, गैस्ट्रिक अल्सर, एसिडिटी, घबराहट, आंतों से सम्बंधित कोई भी रोग कभी नजदीक भी नहीं फटकेगा ऐंवम – बेवजह की तृष्णा, ईर्ष्या, घृणा, चुगली, अनावश्यक मोह आदि से दूर हो – हमारा व्यक्तित्व निखर जाएगा।हम देखते हैं की शहीद भगत सिंह, नेता जी सुभाष चंद्र, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, महात्मा बुद्ध आदि महापुरुष- इन सभी के ये तीनों उपरोक्तवर्णित चक्र भलीभाँति संतुलित थे – व इसी कारण से ये सभी – अपने अपने – अति कठिन उद्देश्यों को प्राप्त कर सके थे। मणिपुर चक्र तक की सन्तुलन यात्रा को मुख्यता उन्नत शारीरक उपलब्धि कहें तो इस के प्रभाव से अनाहत चक्र के संतुलन प्रकिया से हमारी आध्यात्मिक उन्नति भी प्रारंभ हो जाती है। यानि – मणिपुर चक्र ऐंवम अनाहत चक्र – शारीरिक ऐंवम आध्यात्मिक सीमाओं के कमांडर्स हैं व एक दूसरे के पूरक भी हैं। एक तरफ – सन्तुलित मणिपुर चक्र से ही – अनाहत चक्र का संतुलन सम्भव है तो दूसरी तरफ – यदि – सफलतम मणिपुर चक्र में कभी अहम भावना से विकार उत्पन्न होने की सम्भावनाएं आ जाएं तो – सन्तुलित अनाहत चक्र – ऐसा कभी होने नहीं देता। मणिपुर चक्र तक के संतुलन से – “अनाहत” यानि ह्रदय चक्र में भी – Selfless प्रैम करने – खुशियाँ बांटने की व हमारे हृदय में कुछ और भी अधिक अच्छा करने की – अपने ज्ञान से – शक्ति से – ज्वाला ऊपर की ओर अग्रसित होगी तो अगले अनाहत चक्र में – स्वतः ही – दिल में ह्रदय में भीतर से – मणिपुर चक्र से प्राप्त मणियों यानि धन से – बल से – ज्ञान से – करुणा से अथवा अन्य किसी विधि से – परमार्थ कार्य करने की- परोपकार करने की सदिच्छा जन्म लेती है। इस से – हमारा अनाहत चक्र और भी अधिक मात्रा में संतुलित होता चला जता है व हमारा दृष्टिकोण और भी अधिक सकारात्मक व ऊर्जा से परिपूर्ण होता जाता है। ह्रदय से नासिका के ऊपरी भाग तक की सभी इंद्रियां भी अनाहत चक्र स्थान के अधीन ही होती हैं व यहीं से – प्राण वायु के संचार से सभी अंगों में अन्न-जल से बना रस पहुचता है व वीर्य बनता है, तथा यहीं से पसीने व मूत्र के माध्यम से अनुपयुक्त जल – शरीर से बाहर निकलता है। जागृत अनाहत चक्र – सदैव ही – करुणा – कम्पैशन से लबरेज रहता है! इस के अतिरिक्त – ह्रदय, BP, स्तन कैंसर, अस्थमा-स्वांस ऐंवम फेफड़ों से सम्बंधित रोग भी कभी दुखी नहीं करेंगे। सन्तुलित अनाहत चक्र से व्यक्ति में – क्रिएटिविटी बढ़ – मानवतावादी – सर्व जन हितैषी, सर्व प्रिय – सर्व हितैषी व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

तत्पश्चात – उपरोक्तवर्णित चारों चक्र सन्तुलन से – अब बारी आती है – हमारे – विशुद्ध चक्र की। विशुद्ध चक्र साधना में – हमेशा – अधिक से अधिक सत्य वचन बोलने के संकल्प लेने व उस पर अमल करने के प्रयास से – विशुद्ध चक्र और भी अधिक मात्रा में सन्तुलित होने लगता है। उल्लेखनीय है की – निरन्तर मिथ्या भाषण करने वालों का विशुद्ध चक्र असुंतलित होता चला जाता है। यकीन मानिए – विशुद्ध चक्र के संतुलन से – अनाहत चक्र ऐंवम ऊपर के आज्ञा व सहस्रार चक्र संतुलन की सम्भावनाएं भी अति प्रबल हो जाती हैं। यही वो स्थान है – जहां – समुद्रमंथन पश्चात – महादेव शिव ने विषपान कर विष को कंठ में समाहित कर – नीलकंठ महादेव कहलाये थे। यह इस बात का भी घोतक है की – विशुद्ध चक्र संतुलन से मनोशारीरिक टॉक्सिन्स को कैसे दूर किया जा सकता है। अच्छे – उदार, करुणामय ऐंवम विशाल अनाहत चक्र के संतुलन फलस्वरूप – विशुद्ध चक्र जागरण की यात्रा भी शुरू होने लगती है।  ऐंवम सच कहें तो अनाहत चक्र संतुलन के प्रभाव से शुरू हो चुकी हमारी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा – यहीं – विशुद्ध चक्र सन्तुलन से ही प्रारंभ होती है। ऐसा व्यक्ति सरस्वती स्थान पर स्थित अपने कंठ से जो कुछ भी बोलेगा – वो freely flawless – truthfull expression का पुट लिए होगा ऐंवम कठिन से कठिन वक्तव्य को भी freely express कर सदैव मिथ्या भाषण से बच प्रभावी वाणी ही बोलेगा। सब उस व्यक्ति को सुनना समझना चाहेंगे। व्यक्ति में धैर्यपूर्वक बातों को सुनने ऐंवम कहने की छमता उत्पन्न होती है। इस के सतत अभ्यास से वाणी की सिद्धि प्राप्ति भी सम्भव है। इसके अतिरिक्त – कंठ, बार बार होने वाले कोल्ड, इंफेक्शन, गर्दन व कन्धा दर्द, कानों, जिव्हा, माउथ, जबड़े, थाइरोइड, हार्मोनल, मेनोपॉज सम्बंधित कोई रोग भी – कभी भी नजदीक नही फटकेगा।व्यक्ति – सत्यनिष्ठ, कुशल, मधुर, व्यर्थ के तर्क वितर्क से दूर रह – बिना किसी अहम के – हर प्रकार की सम व विषम परिस्थितियों पर नियंत्रण करने में दक्ष हो जाता है। यदि ये पहले पांचों चक्र ऐंवम पंचतत्त्व सन्तुलित हो गए तो समझो – आज्ञा ऐंवम सहस्रार चक्र भी सन्तुलित हो गए। अब मस्तिष्क में दोनों भोहों के मध्य – गुरु स्थान पर स्थित आज्ञा चक्र के संतुलन से – हम निर्णय लेने में दूरदर्शिता का परिचय दे – गलत कार्य करने से सवेंम को बचा कर रख पाते हैं। सन्तुलित आज्ञा चक्र स्थान पर आ कर ही – इड़ा पिंगला नाड़ियां – सम हो – सुषुम्ना नाड़ी में – समाहित हो – व्यक्ति को समाधि अवस्था को ओर अग्रसर करती हैं। इसी से – सर्वोच चेतना प्रप्ति हो – अलौकिक ज्ञान ऐंवम बौद्धिक सम्पन्नता हसिल होती है। यही स्व ऐंवम ईश्वर – के एकीकरण की अवस्था है। इस के संतुलन से – आंखों व माथे से सम्बंधित आधासीसी माइग्रेन, मतिभ्रमित होने वाले रोगों से बचा जा सकता है। सँग में – शांत प्रकृति के बन – migrains, headache, poor vision & poor life vision से उत्पन्न अकेलेपन महसूस करने जैसे असाध्य रोगों से छुटकारा पा सकते हैं। अब मोक्ष द्वार यानि सहस्रार चक्र के संतुलन से प्रभु निकटता रखने के भाव को फलस्वरुप व बिना कंफ्यूज़ रह कर – हम peacefull life जीते हैं। यहीं पर – आज्ञा चक्र के स्थान से प्रारम्भ हुईं – पिट्यूटरी – पिनियल का केंद्र है, जिस से समस्त शरीर को नियंत्रित किया जा सकता है तथा यही वह कुंजी है – जिस से – रुट चक्र से लेकर आज्ञा चक्र तक के चक्रों को संतुलित व जागृत किया जाना सम्भव है। इस के संतुलन से – हैड्क, मिर्गी, नाड़ी शूल, मानसिक, त्वचा सम्बंधित ऐंवम अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है।

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